इंटरस्टेट माइग्रेशन एलायंस और एचईएलएम स्टूडियो आपको गुड़गांव में परिधान और घरेलू काम के क्षेत्र में कार्यरत प्रवासी मजदूरों के साथ वार्तालाप के लिए आमंत्रित करता हैं- जोकिदिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का एक हलचल और भीड़भाड़ भरा औद्योगिक केंद्र है। लॉकस्टिच लाइव्स: मीग्रेंट्स एंड डीमेगासिटी, 360 डिग्री इंटरैक्टिव डॉक्यूमेंट्री, उपयोगकर्ता को गुड़गांव के पड़ोस में ले जाते हैं। लॉन्चस्टिच लाइव्स 360 डिग्री वीडियो, मल्टीमीडिया इंटरैक्टिव ईमेज, फोटोग्राफी और वीडियो का उपयोग कर, दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने और काम करने की परिस्थिति पर अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

भारत की दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र – (एनसीआर) भारत का सबसे अधिक आबादी वाला शहर- जहां भारत के भीतर असंतुलित आर्थिक विकास का भव्य प्रदर्शन होता है, जो ग्रामीण शहरी प्रवासन को बढ़ावा देता है और इसतरहयहां शहरी औद्योगिक हब के भीतर प्रवासी मजदूरों का जमावड़ा हो गया है। चूंकि दिल्ली-एनसीआर अलग-अलग गांवों, नगरपालिका और राज्य अधिकार क्षेत्र में फैला में फैला है, शहरी नियोजन पट्टी से प्रवासी समुदायों को अपने देश के भीतर ही मूल नागरिक अधिकारों से वंचित किया गया है। नतीजतन, जब राष्ट्रीय नागरिकता एक बार यूनिवर्सल रूप से सदस्यता में शामिल हो सकती है, तब यह वितरण में बहुत अधिक असमान है।

लॉकस्टिचलाइव्स: मीग्रेंट्स एंड डी मेगासिटी, जीवन में वहिष्कृत शहरीकरण से जुड़े चुनौतियों पर प्रकाश डालती है। डूंडाहेड़ा के पड़ोस मुल्लाहेरा, सिकंदरपुर पहाड़ी और करतारपुरी की परिस्थितियों और निवासियों के जीवन के बारे में खोजबीन करती है। घरों में जहां प्रवासी रहते हैं और उनकी कहानियां सुनी जाती है कि वह किस तरह अपनी चुनौतियों का वर्णन करते हैं जैसे स्वच्छ पानी और सफ़ाई व्यवस्था जैसी सुविधा तक का न होना, मकान मालिकों के निर्देशानुसार चलना घर पर और काम पर होने वाली हिंसा से खुद को सुरक्षित रखना जैसी बातें शामिल हैं। दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का यह अनुभव व्यक्तिगत गहराई से देखे तो अनोखा है – और जो दुनियाभर में मेगासिटी में प्रवासी मजदूरों के जीवन और कामकाजी परिस्थितियो की एक रुपरेखा और सही मायने में एक आईना दिखाने का काम करती है।

सिकंदरपुर पहाड़ी

सिकंदरपुर पहाड़ी

भीड़भाड़ वाली सिकंदरपुर बस्ती की तुलना में इस अनौपचारिक जगह को एक “गांव” के रूप में वर्णित किया गया है। स्थानीय निवासियों ने सिकंदरपुर पहाड़ी के सब से प्रत्यक्षमार्ग को अवरुद्धकर दिया है। अब, काम पर जाने विद्यालय, चिकित्सा सुविधाओं और अन्य नागरिक सुविधाओं, के लिए श्रमिकों और उनके परिवारों को, एक घुमावदार मार्ग या अधिक प्रत्यक्ष लेकिन खतरनाक पैदल रास्ते का प्रयोग करना पड़ता है जहां पर दिन की रोशनी में भी चोरी हो जाती है और महिलाओं के यौन उत्पीड़न का डर भी रहता है।

कापसहेड़ा

कापसहेड़ा

अनियमित मकान मालिकों के सख्त नियंत्रण में प्रवासी श्रमिक और उनका परिवार एक कमरे में , जोकि एक तरफ से एक के बाद एक पैक तरीके से बने होते हैं उनमें रहते है, इस श्रमिक आवास ईकाई में, 70 से अधिक परिवार को सिर्फ 8 शौचालयो से काम चलाना पड़ता है। यहां स्वच्छता और सफाई की कमी का घोर नज़ारा साफ़ देखा जा सकता है हालत यहां तक होते हैं कि, श्रमिकों के घरों से 10 मीटर से भी कम दूरी पर मानव मल-मूत्र और कचरा इकट्ठा रहता है।

सिकंदरपुर बस्ती

सिकंदरपुर बस्ती

यह अनौपचारिक बस्ती प्रवासी श्रमिकों का घर है, जो विशेष रूप से बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर से है, जिन्होंने वहां आस पास के जगहों में स्थित मेट्रोलाइन, सड़कों, होटल, कार्यालय भवन और मॉल का निर्माण किया है। पिछले 10 वर्षों में इनकी संख्या 200 से बढ़कर लगभग 2000 के बीच हो गयी है। उनके पास पानी का निश्चित श्रोत, शौचालय या बिजली नहीं है. सिकंदरपुर बस्ती सामान्य रूप से तोड़-फोड़ के कगार पर है।

डंडाहेरा

डंडाहेरा

खासकर किरायदारों के लिए निर्मित इस आवास क्षेत्र में ज़्यादातर प्रवासी श्रमिकों का घर है। परिधान और अन्य विनिर्माण उद्योगों में अस्थिर रोजगार से संबंधित होने के कारण, श्रमिकों को नियमित रूप से बिना नोटिस के निकाल दिया जाता है – जिससे वह कर्ज के दुष्चक्र में फंस जाते है। मकान मालिक उनकी इन कमजोरियों का फायदा उठाते हैं। यहां तक कि सबसे बुनियादी जरूरत जैसे कि चावल, आटा और कम बिजली की खपत करने वाला एक छोटा सा बल्व व सीलिंग पंखा के लिए श्रमिकों से अधिक दाम लिए जाते है।

करतारपुरी

करतारपुरी

करतारपुरी, गुड़गांव में ज़्यादातर विशाल आवास परिसरों और कार्यालय भवनों में घरेलू और हाउस कीपिंग के रूप में कार्यरत प्रवासी कामगारों का घर है। सार्वजनिक परिवहन की पहुंच न होने के करण, प्रवासी महिला कर्मचारी एक दिन में दो बार, अपने कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए मीलों दूर तक पैदल चलते हैं – कुछ सुबह 2 या 3 के बजे ही निकल लेते हैं। ज़्यादातर श्रमिक सूर्योदय से पहले घर से निकल लेते है और अंधेरे होने के बाद ही लौटते हैं, महिलाओं को नियमित रूप से उत्पीड़न और समस्या का सामना करना पड़ता है।